Rao Nitin Akhajiya અમે આભારી છિએ તમારા...કે તમે અમને આ માહિતી મોકલાવી....
" ब्रम्हाराव" उसी बिंदु से महासिंधु की , पहचान अमर होती हैं। उद्दाम लहर का उन्नायक , वही लुटाता मोती हैं।।
उस सत्य सनातन का वाहक, क्षात्र धर्म का व्याख्याता। इतिहास अमर का आलेखक, में आर्तजनों का त्राता।।
ब्रम्हा यज्ञ का प्रतिफल हु मै, वहनि शिखा का तेज धरे। जो कंचन के उपवीत पहिन, जग में विप्लव नाद करे।।
"शक्ति पुत्र" का संज्ञा धारी, दुर्गा का पयपान किया।
मै तारक कातर आँखों का, शिव ने तारक मंत्र दिया।।
महिपालो से पूजित होकर, में "पूजनीक" कहलाया ।
राष्ट्र प्रेम का अमर पुजारी, रक्त बिंदु से मोल चुकाया।।
मानव मन में करुना प्लावन, जब घोर घटा सा छाया।
अनल शिला को काट काट कर, निर्झर के मान बहाया।।
छन्द शास्त्र का सिंदू रचा तो, नवरस की गागर लाया।
मरु ह्रदयो को अभिसिंचित कर, अलंकार सब पहनाया।।
वेश खड्ग के कलम चली जब, खड्ग कलम के वेश चली । पृथक प्रकृति परिपूरक होकर, शौर्य साधना साथ पली।।
वाणी का मै वरद पुत्र हु, रण चंडी का वर पाया।
" वरदाई " विख्यात जगत में, सब ग्रंथो ने यश गाया।। निर्भय निनाद युग युग मेरा, रवघोष गगन में छाया। बन कर निमित्त ब्रम्हा कार्य का, मै " ब्रम्हाराव " कहलाया।।
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