Sunday, 29 January 2017

वसंत पंचमी का महत्व ..

वसंत पंचमी या श्रीपंचमी एक हिन्दू त्योहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं।

प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था।

जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों मे सरसों का सोना चमकने लगता,  जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं,आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगीतितलियाँ मँडराने लगतीं। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था  जिसमें  विष्णु  और  कामदेव  की पूजा होती , यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था।

शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।

बसन्त पंचमी कथा

सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है।

विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा।

इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया।

जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी।

तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।

अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्णने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।
पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है।

लेकिनपतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा।

पर्व का महत्व

वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है।

यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है।

जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या?

जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।

पौराणिक महत्व

इसके साथ ही यह पर्व हमें अतीत की अनेक प्रेरक घटनाओं की भी याद दिलाता है। सर्वप्रथम तो यह हमें त्रेता युग से जोड़ती है।

रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य भी था।

यहीं शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम में पगे झूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया।

दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था।

वसंत पंचमी के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रध्दा है कि श्रीराम आकर यहीं बैठे थे। वहां शबरी माता का मंदिर भी है।

ऐतिहासिक महत्व

वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तानले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं।

इसके बाद की घटना तो जगप्रसिद्ध ही है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान ॥

पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंदबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192 ई) यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।

वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा?

बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।

कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया।

यह घटना वसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अत: पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।

वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक प्रवष्त्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिश्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया।

गुरू रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उध्दार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने भी सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिश्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था।

1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये। उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया, पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अत: युध्द का पासा पलट गया।

इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872 को मलेरकोटलामें तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।

जन्म दिवस

वसंत पंचमी हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकविसूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस (28.02.1899) भी है। निराला जी के मन में निर्धनों के प्रति अपार प्रेम और पीड़ा थी। वे अपने पैसे और वस्त्र खुले मन से निर्धनों को दे डालते थे। इस कारण लोग उन्हें 'महाप्राण' कहते थे।

Wednesday, 25 January 2017

એક પરિચય :- રાજા બિરબલ , welcome Brahmbhatt

રાજા બિરબલ 

અકબરકાળમાં મોગલ શાસનના વઝીર-એ-આઝમ હતા. તેઓ અકબરના નવરત્નો પૈકીના એક તથા સૌથી વિશ્વાસૂ વ્યક્તિ હતા.

તેઓ મુખ્યત્વે તેઓ રાજકીય પ્રશ્નો તથા લશ્કરની જવાબદારી સંભાળતા.

બિરબલ તેમની કુશાગ્ર બુદ્ધિમતા અને વ્યવહારકુશળતા માટે ખુબ જાણીતા છે.

અકબર-બિરબલની લોકવાર્તાઓ ખુબ જ પ્રસિદ્ધિ પામી છે.

ઈ. સ. ૧૫૨૮માં હાલના મધ્ય પ્રદેશ રાજ્યમાં આવેલા સિંન્ધ જિલ્લાના ઘોઘરા ગામમાં  બ્રહ્મણ (  મધ્ય પ્રદેશમા બ્રહ્મભટ્ટ ભટ્ટ બ્રાહ્મણ લખાવે છે ) પરીવાર જન્મેલા બિરબલનું મુળ નામ મહેશદાસ ( શિવના સેવક ) કે મહેશ ભટ્ટ  હતું.

બિરબલની લેખન અને કવિતાની પ્રસિદ્ધિએ તેમને શહેનશાહ અકબરના દરબારમાં મહત્વનું સ્થાન અપાવ્યું અને અકબર તરફથી તેમને બિરબલ નામ તથા રાજા તરીકેનું બિરુદ આપવામાં આવ્યું.

રાજા બિરબલનું મૃત્યુ મલંદરિની લડાઇમાં થયું. તેમના મૃત્યુના સમાચારે અકબરને શોકમગ્ન કરી દિધા.

ब्रम्हाराव : - Rao Nitin akhajiyaa

Rao Nitin Akhajiya અમે આભારી છિએ તમારા...કે તમે અમને આ માહિતી મોકલાવી....

" ब्रम्हाराव" उसी बिंदु से महासिंधु की , पहचान अमर होती हैं। उद्दाम लहर का उन्नायक , वही लुटाता मोती हैं।।
उस सत्य सनातन का वाहक, क्षात्र धर्म का व्याख्याता। इतिहास अमर का आलेखक, में आर्तजनों का त्राता।।
ब्रम्हा यज्ञ का प्रतिफल हु मै, वहनि शिखा का तेज धरे। जो कंचन के उपवीत पहिन, जग में विप्लव नाद करे।।
"शक्ति पुत्र" का संज्ञा धारी, दुर्गा का पयपान किया।
मै तारक कातर आँखों का, शिव ने तारक मंत्र दिया।।
महिपालो से पूजित होकर, में "पूजनीक" कहलाया ।
राष्ट्र प्रेम का अमर पुजारी, रक्त बिंदु से मोल चुकाया।।
मानव मन में करुना प्लावन, जब घोर घटा सा छाया।
अनल शिला को काट काट कर, निर्झर के मान बहाया।।
छन्द शास्त्र का सिंदू रचा तो, नवरस की गागर लाया।
मरु ह्रदयो को अभिसिंचित कर, अलंकार सब पहनाया।।
वेश खड्ग के कलम चली जब, खड्ग कलम के वेश चली । पृथक प्रकृति परिपूरक होकर, शौर्य साधना साथ पली।।
वाणी का मै वरद पुत्र हु, रण चंडी का वर पाया।

" वरदाई " विख्यात जगत में, सब ग्रंथो ने यश गाया।। निर्भय निनाद युग युग मेरा, रवघोष गगन में छाया। बन कर निमित्त ब्रम्हा कार्य का, मै " ब्रम्हाराव " कहलाया।।

Friday, 20 January 2017

चंदबरदाई (ચંદ બારોટ ) : sunil kumar Barot

चंदबरदाई (ચંદ બારોટ )

(जन्म: संवत 1205 तदनुसार 1148 ई०लाहौर वर्तमान में पाकिस्तान में - मृत्यु: संवत 1249 तदनुसार 1191 ई० गज़नी) हिन्दी साहित्य के वीर गाथा कालीन कवि तथा पृथ्वीराज चौहान के मित्र थे। उन्होंने अपने मित्र का अन्तिम क्षण तक साथ दिया।

चंदबरदाई का चित्र हिन्दी साहित्यकार चित्रावली के सौजन्य से

जीवनी

चंदबरदाई का जन्म लाहौर में हुआ था, वह जाति का राव या भाट था। बाद में वह अजमेर-दिल्ली के सुविख्यात हिंदू नरेश पृथ्वीराज का सम्माननीय सखा, राजकवि और सहयोगी हो गया था। इससे उसका अधिकांश जीवन महाराजा पृथ्वीराज चौहान के साथ दिल्ली में बीता था। वह राजधानी और युद्ध क्षेत्र सब जगह पृथ्वीराज के साथ रहा था। उसकी विद्यमानता का काल 13 वीं शती है। चंदवरदाई का प्रसिद्ध ग्रंथ "पृथ्वीराजरासो" है। इसकी भाषा को भाषा-शास्त्रियों ने पिंगल कहा है, जो राजस्थान में ब्रजभाषा का पर्याय है। इसलिए चंदवरदाई को ब्रजभाषा हिन्दी का प्रथम महाकवि माना जाता है। 'रासो' की रचना महाराज पृथ्वीराज के युद्ध-वर्णन के लिए हुई है। इसमें उनके वीरतापूर्ण युद्धों और प्रेम-प्रसंगों का कथन है। अत: इसमें वीर और श्रृंगार दो ही रस है। चंदबरदाई ने इस ग्रंथ की रचना प्रत्यक्षदर्शी की भाँति की है अंत: इसका रचना काल सं. 1220 से 1250 तक होना चाहिए। विद्वान 'रासो' को 16वीं अथवा उसके बाद की किसी शती का अप्रमाणिक ग्रंथ मानते हैं।

हिन्दी के पहले कवि

चंदबरदाई को हिंदी का पहला कवि और उनकी रचना पृथ्वीराज रासो को हिंदी की पहली रचना होने का सम्मान प्राप्त है। पृथ्वीराज रासो हिंदी का सबसे बड़ा काव्य-ग्रंथ है। इसमें 10,000 से अधिक छंद हैं और तत्कालीन प्रचलित 6 भाषाओं का प्रयोग किया गया है। इस ग्रंथ में उत्तर भारतीय क्षत्रिय समाज व उनकी परंपराओं के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है, इस कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका बहुत महत्व है।

वे भारत के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के मित्र तथा राजकवि थे। पृथ्वीराज ने 1165 से 1192 तकअजमेर व दिल्ली पर राज किया। यही चंदबरदाई का रचनाकाल भी था।

गोरी के वध में सहायता

इनका जीवन पृथ्वीराज के जीवन के साथ ऐसा मिला हुआ था कि अलग नहीं किया जा सकता। युद्ध में, आखेट में, सभा में, यात्रा में, सदा महाराज के साथ रहते थे और जहाँ जो बातें होती थीं, सब में सम्मिलित रहते थे। यहां तक कि मुहम्मद गोरी के द्वारा जब पृथ्वीराज चौहान को परास्त करके एवं उन्हे बंदी बना करके गजनी ले जाया गया तो ये भी स्वयं को वश मे नही कर सके एवं गजनी चले गये। ऐसा माना जाता है कि कैद मे बंद पृथ्वीराज को जब अन्धा कर दिया गया तो उन्हें इस अवस्था में देख कर इनका हृदय द्रवित हो गया एवं इन्होंने गोरी के वध की योजना बनायी। उक्त योजना के अंतर्गत इन्होंने पहले तो गोरी का हृदय जीता एवं फिर गोरी को यह बताया कि पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण चला सकता है। इससे प्रभावित होकर मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज की इस कला को देखने की इच्छा प्रकट की। प्रदर्शन के दिन चंद बरदायी गोरी के साथ ही मंच पर बैठे। अंधे पृथ्वीराज को मैदान में लाया गया एवं उनसे अपनी कला का प्रदर्शन करने को कहा गया। पृथ्वीराज के द्वारा जैसे ही एक घण्टे के ऊपर बाण चलाया गया गोरी के मुँह से अकस्मात ही "वाह! वाह!!" शब्द निकल पड़ा बस फिर क्या था चंदबरदायी ने तत्काल एक दोहे में पृथ्वीराज को यह बता दिया कि गोरी कहाँ पर एवं कितनी ऊँचाई पर बैठा हुआ है। वह दोहा इस प्रकार था:

चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान! ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान!!

इस प्रकार चंद बरदाई की सहायता से से पृथ्वीराज के द्वारा गोरी का वध कर दिया गया। इनके द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो हिंदी भाषा का पहला प्रामाणिक काव्य माना जाता है।

મહર્ષિ ભારદ્વાજ

મહર્ષિ ભારદ્વાજ (સંસ્કૃત भारद्वाज)

એ સપ્તર્ષિઓમાં ના એક મહર્ષિ ગણવામાં આવે છે. તેમના દ્વારા રચિત ‘ વૈમાનિકમ્ શાસ્ત્રમ્ ‘માં વિમાન બનાવવાની માહિતીનું સવિસ્તાર વર્ણન છે. યંત્ર સર્વસ્વ નામના ગ્રંથમાં ઉડ્ડયન વિજ્ઞાન અને વિમાન શાસ્ત્ર યંત્રાધિકરણ નામના ગ્રંથમાં વિમાનોના રક્ષણ અંગે વર્ણન કરાયું હતું.

ભારદ્વાજ મુનિ ગુરૂ દ્રોણ (દ્રોણાચાર્ય)નાં પિતા હતા, અને કળીયુગનાં સાત અમર મહાત્મા (ચિરંજીવીઓ) પૈકિનાં એક,અશ્વત્થામાનાં દાદા હતાં.

ભારદ્વાજ મુનિનાં વંશજ ગણાતા ઉત્તર ભારતનાં અમુક બ્રાહ્મણો પોતાની અટક ભારદ્વાજ લખે છે, બી.આર. ચોપ્રા રચિત પ્રસિદ્ધ મહાભારત ધારવાહિક (ટી. વી.)માં કૃષ્ણનું પાત્ર ભજવનાર કલાકાર પણ આ જ ભારદ્વાજ સમુદાયનો છે, જેનું નામ છે ડૉ. નિતિષ ભારદ્વાજ. આ સિવાય મોટા ભાગનાં બ્રાહ્મણો અને દક્ષિણ ભારતનાં કેટલાક ક્ષત્રિયોમાં પણ ભારદ્વાજ ગોત્ર હોય છે.

Monday, 16 January 2017

ભાષા મારી ગુજરાતી છે.:- મેહુલ બ્રહ્મભટ્ટ

ગર્વ છે ...મને...ભાષા મારી ગુજરાતી છે.

"દરેક ભાષા સન્માનિય છે " ...

જે આપણને ' જ્ઞાન ' આપે છે ...
                પણ 
માતૃભાષા એ માતૃભાષા !!!

જે ભાષામા પ્રેમ હોય જે ભાષા મા લાગણી હોય જે ભાષામા સન્માન હોય તે  "માતૃભાષા"

તમે સમય સાથે તાલ મિલાવવા દરેક ભાષાને શિખો પણ "માતૃભાષા" ના ભોગે નહી...

મેહુલ બ્રહ્મભટ્ટ ( સોતમલા , ડીસા , બનાસકાંઠા)